एक सत्संग गोष्ठी में कोई पैंसठ लोग हिस्सा ले रहे थे। गोष्ठी पूरे दिन चलनी थी, इसलिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी की गई। भोजन समाप्त हुआ और लोग वापस लौटने लगे। दरवाजे पर हर व्यक्ति को एक गुब्बारा दे दिया गया और उस पर अपना नाम लिखने के लिए कहा गया।
सारे गुब्बारे दूसरे कमरे में रख दिए गए। फिर लोगों को कमरे में जाकर अपना गुब्बारा खोजने को कहा गया; वह भी महज तीन मिनट में।
सुनते ही लोग एक-दूसरे को धक्का देते हुए गुब्बारा खोजने लगे। इस धक्कामुक्की के कारण कमरे में भारी अराजकता फैल गई। लोग एक-दूसरे से टकरा रहे थे, ऊपर गिर रहे थे, गुब्बारा खोजने के बजाय उनका वक्त अपना बचाव करने में ही निकल गया, और किसी भी व्यक्ति को अपने नाम का गुब्बारा नहीं मिला।
फिर उनसे कहा गया कि अब वे एक-एक कर कमरे में जाएं और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएं। देखें कि उस गुब्बारे पर किसका नाम लिखा है। और जिसका नाम लिखा है, उस व्यक्ति को गुब्बारा दे दें। इस तरह दो मिनट में ही हर व्यक्ति को अपना नाम लिखा गुब्बारा मिल गया।
तब गुरु ने कहा, जीवन में भी यही होता है कि लोग अपने इर्द-गिर्द खुशियों की तलाश कर रहे हैं, लेकिन वह उन्हें नहीं मिल रही। असल में दूसरों की खुशी में ही हमारी खुशी है। आप उन्हें उनकी खुशियां सौंप दें, आपको अपनी खुशी मिल जाएगी।
सारे गुब्बारे दूसरे कमरे में रख दिए गए। फिर लोगों को कमरे में जाकर अपना गुब्बारा खोजने को कहा गया; वह भी महज तीन मिनट में।
सुनते ही लोग एक-दूसरे को धक्का देते हुए गुब्बारा खोजने लगे। इस धक्कामुक्की के कारण कमरे में भारी अराजकता फैल गई। लोग एक-दूसरे से टकरा रहे थे, ऊपर गिर रहे थे, गुब्बारा खोजने के बजाय उनका वक्त अपना बचाव करने में ही निकल गया, और किसी भी व्यक्ति को अपने नाम का गुब्बारा नहीं मिला।
फिर उनसे कहा गया कि अब वे एक-एक कर कमरे में जाएं और कोई भी एक गुब्बारा उठाकर ले आएं। देखें कि उस गुब्बारे पर किसका नाम लिखा है। और जिसका नाम लिखा है, उस व्यक्ति को गुब्बारा दे दें। इस तरह दो मिनट में ही हर व्यक्ति को अपना नाम लिखा गुब्बारा मिल गया।
तब गुरु ने कहा, जीवन में भी यही होता है कि लोग अपने इर्द-गिर्द खुशियों की तलाश कर रहे हैं, लेकिन वह उन्हें नहीं मिल रही। असल में दूसरों की खुशी में ही हमारी खुशी है। आप उन्हें उनकी खुशियां सौंप दें, आपको अपनी खुशी मिल जाएगी।
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