| बचपन वाला इतवार जब लगे पैसा कमाने, तो समझ आया, शौक तो मां-बापके पैसों से पुरे होते थे, अपने पैसोंसे तो सिर्फ जरूरतें पुरी होती है। एक घड़ी ख़रीदकर हाथमे क्या बाँध ली.. वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!! सोचा था घर बना कर बैठुंगा सुकून से.. पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!! सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब.... बचपन वाला 'इतवार' अब नहीं आता!! |
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